भारतीय शेयर बाजार में मंदी का दौर जारी है, बीएसई 500 में से 481 शेयर अपने 52-सप्ताह के उच्चतम स्तर से 10% से ज्यादा नीचे आ गए हैं. कमजोर आय और विदेशी पूंजी के बहिर्गमन ने इस गिरावट में योगदान दिया है, जिससे संभावित मंदी के बाजार के बारे में चिंता बढ़ गई है, क्योंकि बीएसई 500 सूचकांक 17% नीचे है.
भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली की वजह से सभी क्षेत्रों के शेयरों प्रभावित हुए है,जिसकी वजह से अधिकांश शेयर अपने 52-सप्ताह के उच्चतम स्तर से काफी नीचे चले गए हैं.
कैपिटलमार्केट के आंकड़ों के मुताबिक, 25 फरवरी मंगलवार को बाजार समाप्ति तक बीएसई 500 सूचकांक में शामिल 500 शेयरों में से 481 अपने 52-सप्ताह के उच्चतम स्तर से 10 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुके थे. बीएसई के शेयरों मे से 417 शेयरों में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई थी, ओर 306 शेयरों में 30 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज हुई थी ,और 149 शेयरों में 40 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज हुई है.
उल्लेखनीय रूप से देखा जाये तो, सन फार्मा एडवांस्ड रिसर्च कंपनी, स्टर्लिंग एंड विल्सन, नेटवर्क18 मीडिया और चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन सहित अन्य 36 स्टॉक अपने एक वर्ष के उच्चतम स्तर से 50 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुके है.
बीएसई 500 के उन शेयरों में जो अपने 52-सप्ताह के उच्चतम स्तर से सबसे अधिक गिरे हैं, उनमें सन फार्मा एडवांस्ड रिसर्च कंपनी सबसे ऊपर है, इस कंपनी के शेयर अपने 52-सप्ताह के उच्चतम स्तर 474 से 74 प्रतिशत नीचे आ चुका है. इसके बाद आती है स्टर्लिंग एंड विल्सन कंपनी जो 68 प्रतिशत नीचे आ चुकी है , इसके बाद तीसरे नंबर पर नेटवर्क18 मीडिया जो 63 प्रतिशत नीचे है, चौथे नंबर पर चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन जो 61 प्रतिशत नीचे है , उसके बाद पांचवे नंबर पर अडानी ग्रीन के शेयर जो 61.34 प्रतिशत नीचे गिरे है ,और छठे नंबर पर व्हर्लपूल इंडिया के शेयर है जो 60 प्रतिशत नीचे का स्थान रहा है.
भारतीय शेयर बाजार में मंदी
भारतीय शेयर बाजार में कमजोर आय, आर्थिक विकास की गति में कमी और भारी विदेशी पूंजी बहिर्गमन शेयर बाजार की गिरावट के प्रमुख कारण रहे हैं.
बीएसई 500 सूचकांक 27 सितंबर के अपने उच्चतम स्तर 38,740.08 से 17 प्रतिशत नीचे है. बेंचमार्क सेंसेक्स उसी दिन अपने रिकॉर्ड उच्चतम स्तर 85,978.25 से 13 प्रतिशत नीचे है.
आम तौर पर, शेयर बाजार में अगर सूचकांक में 20 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट आती है, तो इसे मंदी के दौर में माना जाता है. और अगर यह गिरावट 30 प्रतिशत से ज़्यादा है, तो मंदी के दौर के लंबे समय तक बने रहने की संभावना ज़्यादा है.
मेहता इक्विटीज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (शोध) प्रशांत तापसे ने कहा, “जब सूचकांक में 30 प्रतिशत की गिरावट आती है तो बाजार को मंदी के दौर में माना जाता है. ऐतिहासिक रूप से, ऐसी गिरावट कम से कम छह महीने से एक साल तक चलती है. हालांकि, वर्तमान के शेयर बाजार में ऐसा नहीं है.”
टैप्से को उम्मीद है की चौथी तिमाही के नतीजों के बाद बाजार स्थिर हो जाएगा.
“हम वित्त वर्ष 2025 की चौथी तिमाही की आय के बाद और वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही की आय से पहले अप्रैल-जून की अवधि में बहुत जल्द ही निचले स्तर पर पहुंच जाएंगे. पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही में आय कमजोर रही है. यदि चौथी तिमाही की आय स्थिर या थोड़ी बेहतर रहती है, तो वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही की आय बेहतर होगी. उसके बाद सुधार शुरू होगा,” तापसे ने कहा.
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
कोविड के बाद की तेजी ने कई खुदरा निवेशकों को बाजार की ओर आकर्षित किया. हालांकि, पिछले पांच महीनों ने उनकी जोखिम लेने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे उनमें एक तरह की घबराहट पैदा हुई है.
शेयर बाजार एक्सपर्ट का कहना है कि यह बाजार लंबी अवधि के निवेशकों के लिए है. वे उचित मूल्य पर गुणवत्ता वाले शेयर चुनने और उन्हें लंबी अवधि तक रखने की सलाह देते हैं.
इस पर तापसे ने सलाह दी है की , “दीर्घावधि निवेशकों को चिंतित नहीं होना चाहिए अगर उनके पोर्टफोलियो में गुणवत्ता वाले स्टॉक में गिरावट आ रही है, क्योंकि इस गिरावट का एक वैध कारण है. यदि आय के मोर्चे पर भारी निराशा है, तो उन्हें पोर्टफोलियो में फेरबदल करना चाहिए और मौलिक रूप से मजबूत नए स्टॉक खरीदने चाहिए.”